बुढ़ापे में कमजोर हुई आंतों को अब मिलेगी ‘दोबारा जवानी’! वैज्ञानिकों ने ढूंढ लिया तरीका, चूहों पर हुआ कमाल, अब इंसानी कोशिकाओं पर भी कामयाब
वैज्ञानिकों ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली CAR T-सेल थेरेपी को इन्हीं 'सेन्ससेंट सेल्स' को खत्म करने के लिए तैयार किया। यह थेरेपी एक तरह से शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को हथियारबंद करके भेजती है, जो सिर्फ बूढ़ी कोशिकाओं को ढूंढ़कर नष्ट कर देती हैं।
Washington: उम्र बढ़ने के साथ-साथ पाचन तंत्र का कमजोर होना एक आम समस्या है।

लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी क्रांतिकारी थेरेपी विकसित की है, जो बुढ़ापे में आंतों को खुद ही ठीक होने और फिर से जवां बनने की ताकत दे सकती है। इस तकनीक का नाम है ‘CAR T-सेल थेरेपी’, जो अब तक कैंसर के इलाज के लिए जानी जाती थी।
इसे भी पढें: सुरेश कलमाड़ी का सफर: भारतीय वायुसेना के पायलट से भारत के सबसे ताकतवर खेल प्रशासक तक
क्या है यह नई खोज?
कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी (CSHL) के वैज्ञानिकों ने पाया है कि बुढ़ापे में आंतों की अंदरूनी परत (इंटेस्टाइनल एपिथेलियम) ठीक से नई कोशिकाएं नहीं बना पाती। इसकी वजह ‘सेन्ससेंट सेल्स’ नामक कोशिकाओं का जमाव है, जो बूढ़ी हो चुकी होती हैं और शरीर से खत्म नहीं होतीं। यही कोशिकाएं आंतों में सूजन बढ़ाती हैं और ‘लीकी गट सिंड्रोम’ जैसी बीमारियों को जन्म देती हैं।
वैज्ञानिकों ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली CAR T-सेल थेरेपी को इन्हीं ‘सेन्ससेंट सेल्स’ को खत्म करने के लिए तैयार किया। यह थेरेपी एक तरह से शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को हथियारबंद करके भेजती है, जो सिर्फ बूढ़ी कोशिकाओं को ढूंढ़कर नष्ट कर देती हैं।
चूहों पर हुआ सफल प्रयोग
जब इस थेरेपी को बूढ़े और जवान, दोनों तरह के चूहों की आंतों में पहुंचाया गया, तो नतीजे चौंकाने वाले थे।
1- आंतों की अंदरूनी परत तेजी से ठीक होने लगी।
2- सूजन में कमी आई।

3- पोषक तत्वों को सोखने (एब्जॉर्प्शन) की क्षमता बढ़ गई।
4- चोट लगने पर आंतों के ऊतकों के पुनर्जनन (रेजेनरेशन) की रफ्तार बढ़ गई।
रेडिएशन से होने वाले नुकसान से भी मिला बचाव
कैंसर के इलाज के दौरान पेल्विक या पेट के रेडिएशन से अक्सर आंतों को गंभीर नुकसान होता है। वैज्ञानिकों ने चूहों को ऐसा ही रेडिएशन देकर नुकसान पहुंचाया। जिन चूहों को CAR T-सेल थेरेपी दी गई, उनकी आंतें तेजी से ठीक हुईं और यह फायदा एक साल तक बरकरार रहा। सिर्फ एक डोज ने लंबे समय तक सुरक्षा दी।
इसे भी पढें: 12 साल बाद इंडिया टुडे ग्रुप से सौरभ द्विवेदी का इस्तीफा, लल्लनटॉप की कमान अब कुलदीप मिश्रा के हाथ
इंसानों के लिए क्या हैं संभावनाएं?
सबसे उत्साहजनक बात यह है कि जब इस थेरेपी का परीक्षण इंसानी आंत और कोलोरेक्टल (बड़ी आंत) की कोशिकाओं पर किया गया, तो वहां भी पुनर्जनन के सकारात्मक संकेत मिले। इससे उम्मीद जगी है कि भविष्य में यह तकनीक बुजुर्गों और कैंसर मरीजों के लिए वरदान साबित हो सकती है।

यह शोध ‘एजिंग गट’ की समस्या से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए नई उम्मीद की किरण लेकर आया है। हालांकि, अभी यह थेरेपी शुरुआती चरण में है और इंसानों पर परीक्षण में कुछ समय लग सकता है।



