“सिर्फ 10 मिनट दे दीजिए मिलॉर्ड…” जब SC में 19 साल के लड़के की दलीलें सुन पिघल गए जज, हारी बाजी जीत बना डॉक्टर!

NEET अभ्यर्थी अथर्व चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में खुद अपनी पैरवी कर हारी हुई बाजी जीत ली। जानें कैसे 19 साल के इस लड़के ने CJI के सामने रखी अपनी बात और पाया MBBS में दाखिला।

Atharv Chaturvedi NEET Supreme Court Case: आज के दौर में जहां बड़े-बड़े दिग्गज वकील सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दलीलें देते वक्त हिचकिचाते हैं, वहीं मध्य प्रदेश के एक 19 वर्षीय युवक ने इतिहास रच दिया। यह कहानी है अथर्व चतुर्वेदी की, जिन्होंने न केवल सिस्टम की खामियों को चुनौती दी, बल्कि देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सामने खुद अपना पक्ष रखकर न्याय हासिल किया। सोशल मीडिया पर इस समय हर तरफ अथर्व के साहस और सूझबूझ की चर्चा हो रही है।

सिस्टम की नाकामी और एक छात्र का संघर्ष (System failure and one student’s struggle)

जबलपुर, मध्य प्रदेश के रहने वाले अथर्व चतुर्वेदी एक मेधावी छात्र हैं। उन्होंने NEET 2024-25 की परीक्षा में 720 में से 530 अंक हासिल किए थे। EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) श्रेणी में उनकी रैंक 164 थी। इतनी शानदार रैंक होने के बावजूद, उन्हें किसी भी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिला। दाखिला न मिलने का मुख्य कारण राज्य सरकार द्वारा निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण को सही ढंग से लागू न कर पाना था। जब हर दरवाजा बंद नजर आया, तो अथर्व ने हार मानने के बजाय देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का फैसला किया। उन्होंने किसी महंगे वकील के बजाय खुद अपनी पैरवी करने की ठानी।

Atharv Chaturvedi NEET Supreme Court Case
Atharv Chaturvedi NEET Supreme Court Case

“माई लॉर्ड्स, मुझे बस 10 मिनट चाहिए” (“My Lords, I just need 10 minutes”): कोर्ट रूम का वो भावुक पल (That emotional moment in the courtroom)

बीते 10 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में माहौल काफी गंभीर था। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच अपनी सुनवाई समाप्त कर उठने ही वाली थी। तभी वकीलों की भीड़ के बीच खड़े एक 19 साल के लड़के ने पूरी हिम्मत जुटाई और बेहद विनम्रता लेकिन आत्मविश्वास के साथ कहा- “माई लॉर्ड्स, मुझे बस 10 मिनट चाहिए।” अथर्व (Atharva) की इस गुहार ने जजों का ध्यान खींचा। कोर्ट रूम में सन्नाटा पसर गया। अथर्व ने किसी मंझे हुए कानूनविद की तरह संविधान के 103वें संशोधन और अनुच्छेद 15 (6) व 16 (6) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि ये प्रावधान निजी और गैर-अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में 10% EWS आरक्षण को अनिवार्य बनाते हैं, जिसका उल्लंघन उनकी मेरिट के साथ अन्याय है।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (Landmark decision of the Supreme Court): ‘अथर्व’ को मिला अपना हक (‘Atharva’ gets his due)

अथर्व (Atharva) की दलीलों और उनके अटूट आत्मविश्वास को देखकर बेंच भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। कोर्ट ने माना कि अथर्व को उन परिस्थितियों के कारण दाखिले से वंचित रखा गया जो उनके नियंत्रण से बाहर थीं। अदालत ने राज्य के अधिकारियों द्वारा पिछले न्यायिक निर्देशों का पालन न करने पर भी सख्त रुख अपनाया।

इसे भी पढें: सावधान! नहाते समय की ये 4 मामूली गलतियां धीरे-धीरे छीन रही हैं आपका निखार, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ऐसा?

अदालत का फैसला (Court decision):

  • सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और मध्य प्रदेश सरकार को तत्काल निर्देश दिए।
  • एक निजी मेडिकल कॉलेज में अथर्व चतुर्वेदी का MBBS सीट पर दाखिला सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया।
  • कोर्ट ने माना कि नियमों की अनदेखी के कारण एक होनहार छात्र का साल बर्बाद नहीं होना चाहिए।

जीत के बाद अथर्व ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “शुरू में मैं थोड़ा घबराया हुआ था, लेकिन मुझे भरोसा था कि कानून और सच्चाई मेरे पक्ष में है। मैंने बस नियमों का पालन किया और अपनी बात रखी।”

Related Articles

Back to top button