Sanjay Gandhi Hospital: संजय गांधी अस्पताल में अव्यवस्था हावी-सेवा की मिसाल रहा अस्पताल अब भटकाव का केंद्र क्यों?

संजय गांधी अस्पताल (Sanjay Gandhi Hospital) में बढ़ती अव्यवस्था, स्टाफ की राजनीति और सिस्टम फेल होने से मरीज परेशान। कभी सेवा की मिसाल रहा यह अस्पताल अब भटकाव का केंद्र बन गया है।

संजय गांधी अस्पताल (Sanjay Gandhi Hospital) का नाम लेते ही अब चिकित्सा सेवा की जगह अव्यवस्था, भीड़, तनाव और भटकाव की तस्वीर जेहन में उभर आती है।
एक समय था जब यह अस्पताल सेवा, संवेदनशीलता और जवाबदेही का प्रतीक माना जाता था। लेकिन आज हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि मरीज का सफर ओपीडी से शुरू होकर भर्ती होने तक भारी परेशानी से भरा रहता है।

कभी मिसाल रहा अस्पताल,आज राजनीति और निष्क्रियता का शिकार
पहले इस अस्पताल का स्टाफ अपनी त्वरित सेवा के लिए जाना जाता था-नर्सें खुद बेड पर जाकर ब्लड सैंपल लेती थीं,रिपोर्ट मरीजों के हाथ में थमाई जाती थी,एक्स-रे स्टाफ स्ट्रेचर लेकर वार्ड तक पहुंच जाता था।
लेकिन आज परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। कर्मचारियों की आपसी राजनीति, टालमटोल, और प्रशासनिक निष्क्रियता ने व्यवस्था को जड़ से हिला दिया है।

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स्टाफ बढ़ा, सुविधाएं घटी- मरीज बेबस
संजय गांधी अस्पताल (Sanjay Gandhi Hospital) में आउटसोर्स कर्मचारियों और नर्सों की संख्या बढ़ाई जरूर गई है, लेकिन इससे मरीजों की परेशानी कम होने के बजाय और बढ़ गई है।
चोटिल या गंभीर मरीजों को रिपोर्ट, सैंपल और एक्स-रे के लिए ऐसे चक्कर कटवाए जाते हैं मानो अस्पताल नहीं, कोई भूल भुलैया हो।
शहडोल, सिंगरौली और दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले गरीब परिवार इस अव्यवस्था में सबसे ज्यादा पिसते हैं।
बरामदों में मरीजों को लिटाए परिजन रोज जांच केंद्रों के चक्कर काटते नजर आते हैं।

आउटसोर्स कर्मचारी-सुविधा कम,समस्या ज्यादा
सुविधाएं बढ़ाने के नाम पर नियुक्त किए गए आउटसोर्स कर्मचारी अब अस्पताल प्रशासन के लिए सिरदर्द बन चुके हैं।
काम का दबाव बढ़ते ही हड़ताल की धमकी
पृच्छा केंद्र पर बदतमीज़ी,मरीजों को सही मार्गदर्शन तक न देना
इधर जूनियर डॉक्टरों का अहंकार और रूखा व्यवहार मरीज की पीड़ा को और गंभीर बना देता है।
इमरजेंसी में डॉक्टर और वार्ड बॉय का चिड़चिड़ापन कई बार मरीजों व परिजनों को दहशत में डाल देता है।

मरीजों के लिए सबसे मुश्किल:कागज़ी प्रक्रियाएं और तालमेल की कमी
संजय गांधी अस्पताल (Sanjay Gandhi Hospital) की सबसे बड़ी समस्या है-अध्यक्ष और डीन के बीच तालमेल का अभाव।
इस खींचतान का सीधा असर मरीजों पर पड़ता है।

रोजाना OPD में 1500–2000 मरीज, सैकड़ों भर्ती और डिस्चार्ज, लेकिन हर मरीज यही शिकायत लेकर घर जाता है कि पर्ची कटवाने से लेकर भर्ती होने तक कागज बनवाने में ही जान निकल जाती है।

सिस्टम फेल-मरीज ही भुगत रहा है कीमत
अव्यवस्था के चलते,समय पर जांच नहीं,
रिपोर्ट में देरी,वार्ड में बिस्तर की कमी,मार्गदर्शन के नाम पर भ्रम,ये सब मरीजों की पीड़ा को कई गुना बढ़ा देते हैं।
असल सवाल यह है कि स्टाफ बढ़ने के बावजूद अव्यवस्था क्यों बढ़ रही है?
जवाब साफ है-सिस्टम में तालमेल का अभाव और जिम्मेदारी लेने की कमी।

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