Karpuri Thakur: बिहार के पूर्व CM कर्पूरी ठाकुर को मिलेगा भारत रत्न, बड़ी रोचक है उनकी कहानी
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पुरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने का ऐलान किया गया है। केंद्र सरकार की ओर से इसकी घोषणा की गई है। दरअसल राष्ट्रपति भवन की तरफ से बयान जारी कर ये जानकारी दी गई है जिसमें कहा गया कि भारत सरकार को बताते हुए बहुत गर्व हो रहा है कि देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिवंगत कर्पूरी ठाकुर को दिया जा रहा है।

Karpuri Thakur: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पुरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने का ऐलान किया गया है। केंद्र सरकार की ओर से इसकी घोषणा की गई है। दरअसल राष्ट्रपति भवन की तरफ से बयान जारी कर ये जानकारी दी गई है जिसमें कहा गया कि भारत सरकार को बताते हुए बहुत गर्व हो रहा है कि देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिवंगत कर्पूरी ठाकुर को दिया जा रहा है। कर्पुरी ठाकुर भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के पुरोधा और एक प्रेरणादायक शख्सियत थे। राष्ट्रपति भवन की ओर से कहा गया कि यह सम्मान समाज के वंचित वर्ग के उत्थान में कर्पूरी ठाकुर के जीवनभर के योगदान एवं सामाजिक न्याय के प्रति उनके अथक प्रयासों को श्रद्धांजलि हैं।
100वीं जयंति से पहले दी जाएगी भारत रत्न
बिहार के पूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर की बुधवार 24 जनवरी, 2024 को 100वीं जन्म जयंती मनाई जा रही है। उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से नवाजे जाने का ऐलान किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार रिजनल पार्टी जदयू ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने की मांग की थी। वहीं अब इसकी घोषणा राष्ट्रपति भवन की तरफ से कर दी गई है जिसके बाद जदयू ने मोदी सरकार का आभार व्यक्त किया है। इस उपलब्धि पर कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर ने कहा कि हमें 36 साल की तपस्या के बाद यह फल प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि मैं अपने परिवार और बिहार के 15 करोड़ो लोगों की ओर से सरकार को धन्यवाद देना चाहता हू।
कर्पूरी ठाकुर के बारे में संक्षिप्त जानकारी-
बिहार के पूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर का जन्म समस्तीपुर जिले के पितौझिया गांव में हुआ था। उन्होंने पटना से 1940 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद ही स्वतंत्रता आंदोलन गतिविधियों में शामिल हो गए थे। आचार्य नरेंद्र देव के साथ कर्पूरी ठाकुर ने चलना पसंद किया था, जिसके बाद उन्होंने समाजवाद का रास्ता थामा और 1942 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल हुए। कर्पूरी ठाकुर को इसके लिए जेल में भी रहना पड़ा था। 1945 में वे जेल से बाहर आए जिसके बाद कर्पूरी ठाकुर आहिस्ता-आहिस्ता समाजवादी आंदोलन का चेहरा बने। इस आंदोलन का मकसद अंग्रेजों से स्वतंत्रता के साथ-साथ समाज में पनपे जातीय व सामाजिक असमानता को दूर करना था। इसका उद्देश्य था दलित, पिछड़े और वंचित सभी को एक सम्मान की जिंदगी जीने का हक मिले।
राजनीतिक जीवन
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कर्पूरी ठाकुर 1952 में ताजपुर विधानसभा क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के तौर जीत दर्ज की थी जिसके बाद वे MLA बने थे। 1967 के बिहार विधानसभा चुनाव में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी अपना दबदबा कायम कर रह थी। इसी का परिणाम था कि बिहार में पहली बार गैर-कांग्रेस पार्टी की सरकार की एंट्री हुई थी। उस दौरान महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने थे जबकि कर्पूरी ठाकुर को डिप्टी सीएम चुना गया था। कर्पूरी ठाकुर को उस वक्त शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। शिक्षा मंत्री रहते हुए उन्होंने छात्रों की फीस समाप्त कर दी थी वहीं अंग्रेजी की अनिवार्यता भी बंद कर दी गई थी। इन्हीं सब कार्यों के बाद बिहार की राजनीति ने ऐसी करवट ली जिसके बाद कर्पूरी ठाकुर सीएम बन गए।
पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलवाया
कर्पूरी ठाकुर 6 महीने तक सत्ता में रहे। खेतों पर मालगुजारी समाप्त, 5 एकड़ से कम जोत पर मालगुजारी खत्म करने के साथ उर्दू को राज्य की भाषा का दर्जा दे दिया था। इसी के बाद उनकी राजनीतिक ताकत में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई। कर्पूरी ठाकुर बिहार की सियासत में समाजवाद का एक बड़ा माना जाता है। उन्होंने मंडल आंदोलन से भी पहले सीएम रहते हुए पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण प्रदान किया था।



