अमेरिका के वेनेजुएला पर हमले से चीन को मिला कूटनीतिक हथियार, लेकिन ताइवान पर हमले की संभावना अभी कम: विश्लेषक
अमेरिका के वेनेजुएला पर हमले से चीन को ताइवान और दक्षिण चीन सागर पर अपने दावे मजबूत करने का मौका मिला है, लेकिन विशेषज्ञ ताइवान पर तत्काल हमले की संभावना से इनकार कर रहे हैं।
US Venezuela Strike China Taiwan Impact: अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में की गई सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है।

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से चीन को अपने क्षेत्रीय दावों—विशेषकर ताइवान और दक्षिण चीन सागर—पर कूटनीतिक रूप से मजबूती मिल सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि इससे चीन द्वारा ताइवान पर तत्काल सैन्य हमला किए जाने की संभावना नहीं बढ़ती।
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह आक्रामक कदम चीन के लिए “सस्ते राजनीतिक हथियार” (Cheap Ammunition) जैसा साबित हो सकता है। बीजिंग इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका के तथाकथित “नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था” के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है।
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अमेरिका की कार्रवाई और चीन की रणनीतिक सोच
ब्रसेल्स स्थित इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के विश्लेषक विलियम यांग का कहना है कि अमेरिका लंबे समय से चीन पर अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ने के आरोप लगाता रहा है, लेकिन वेनेजुएला में की गई कार्रवाई ने अमेरिका की नैतिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। इससे चीन को भविष्य में अमेरिकी आलोचनाओं का जवाब देने का अवसर मिलेगा।
चीन पहले ही वेनेजुएला पर हमले की कड़ी निंदा कर चुका है। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने इसे “नग्न वर्चस्ववादी व्यवहार” बताया और कहा कि अमेरिका का तथाकथित नियम आधारित आदेश वास्तव में केवल उसके अपने हितों पर आधारित है।
बीजिंग ने मादुरो और उनकी पत्नी की तत्काल रिहाई की मांग भी की है, जिन्हें फिलहाल न्यूयॉर्क में हिरासत में रखा गया है। दिलचस्प बात यह है कि मादुरो की गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने काराकास में एक उच्च स्तरीय चीनी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की थी।
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ताइवान मुद्दे पर चीन का रुख
हाल के हफ्तों में ताइवान पर चीन का दबाव काफी बढ़ा है। पिछले सप्ताह चीनी सेना ने ताइवान के चारों ओर अब तक के सबसे बड़े सैन्य अभ्यास किए, जिससे यह संदेश दिया गया कि चीन किसी भी समय द्वीप को बाहरी मदद से काट सकता है।
हालांकि, बीजिंग स्थित रेनमिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शी यिनहोंग का मानना है कि ताइवान पर कब्जा चीन की सैन्य क्षमताओं पर निर्भर करता है, न कि अमेरिका द्वारा किसी दूरस्थ देश में की गई कार्रवाई पर। उनके अनुसार, चीन की आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां इस फैसले में अधिक अहम भूमिका निभाती हैं।
एशिया सोसाइटी के विश्लेषक नील थॉमस का कहना है कि चीन ताइवान को आंतरिक मामला मानता है, इसलिए वह वेनेजुएला की घटना को सैन्य कार्रवाई के उदाहरण के रूप में पेश नहीं करेगा। इसके बजाय, बीजिंग खुद को शांति और नैतिक नेतृत्व के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करना चाहेगा।

ताइवान की प्रतिक्रिया और बढ़ता जोखिम
ताइवान के सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ सांसद वांग टिंग-यू ने चीन द्वारा ताइवान पर हमले की संभावना को खारिज करते हुए कहा कि “अगर चीन के पास वास्तव में ताइवान पर कब्जा करने की क्षमता होती, तो वह यह काम बहुत पहले कर चुका होता।”
फिर भी, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति ताइवान के लिए जोखिम बढ़ा सकती है। नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लेव नाचमैन के अनुसार, अमेरिका की कार्रवाई भविष्य में चीन के लिए ताइवान के खिलाफ नैरेटिव तैयार करने में सहायक हो सकती है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर भी इस मुद्दे को लेकर भारी चर्चा देखी गई, जहां कई यूज़र्स ने चीन से अमेरिका के कदमों से “सीख लेने” की बात कही।
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कुल मिलाकर, वेनेजुएला में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई ने वैश्विक शक्ति संतुलन में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि इससे चीन को कूटनीतिक लाभ जरूर मिल सकता है, लेकिन ताइवान पर किसी त्वरित सैन्य संघर्ष की आशंका फिलहाल कम ही नजर आती है।



