थोंडिमुथल छेड़छाड़ मामला: पूर्व मंत्री एंटनी राजू को 3 साल की सज़ा, विधायकी गई
केरल के चर्चित थोंडिमुथल छेड़छाड़ मामले में पूर्व मंत्री और मौजूदा विधायक एंटनी राजू को 3 साल की जेल। सज़ा के चलते MLA पद से अयोग्यता, जानिए पूरा मामला।
Thondimuthal Molestation Case: केरल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है।

थोंडिमुथल (जब्त वस्तु) छेड़छाड़ मामले में तिरुवनंतपुरम के पूर्व मंत्री और वर्तमान विधायक एंटनी राजू को अदालत ने तीन साल की सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई है। नेडुमंगाड ज्यूडिशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट कोर्ट का यह फैसला आते ही एंटनी राजू की विधायक सदस्यता स्वतः समाप्त हो गई है।
अदालत ने इस मामले में कोर्ट के पूर्व कर्मचारी जोसे को भी समान सज़ा सुनाई है। दोनों को अपील दायर करने के लिए एक महीने की ज़मानत दी गई है।
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सज़ा के साथ MLA पद से अयोग्यता
अदालत द्वारा दो साल से अधिक की सज़ा दिए जाने के कारण, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8(3) के तहत एंटनी राजू को विधायक पद से अयोग्य ठहराया गया है। इसके अलावा, सज़ा पूरी होने के बाद भी वे छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के अयोग्य रहेंगे।
हालांकि, यदि उच्च न्यायालय से सज़ा और दोषसिद्धि पर स्टे (Stay) मिल जाता है, तो वे चुनाव लड़ने के पात्र हो सकते हैं।
किन धाराओं में हुई सज़ा
अदालत ने दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं में दोषी ठहराया है:
- IPC 120(B) – आपराधिक साजिश: 6 महीने की सज़ा
- IPC 201 – सबूत मिटाने का प्रयास: 3 साल की सज़ा + ₹10,000 जुर्माना
- IPC 193 – झूठा सबूत देना: 3 साल
- IPC 465 – जालसाजी: 2 साल
इसके अतिरिक्त, जोसे को IPC 404 के तहत 1 साल की अलग सज़ा सुनाई गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी सज़ाएं साथ-साथ (Concurrent) चलेंगी।
30 साल पुराना मामला, कैसे हुआ खुलासा
यह मामला 1990 का है। 4 अप्रैल 1990 को तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट पर एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक एंड्रयू साल्वाडोर को अंडरवियर में छिपाकर मादक पदार्थ लाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अदालत में जब्त किए गए अंडरवियर (थोंडिमुथल) को ही मुख्य सबूत बनाया गया।

आरोप है कि उस समय साल्वाडोर के वकील की टीम में शामिल एंटनी राजू, अदालत के क्लर्क जोसे की मदद से उस अंडरवियर में छेड़छाड़ करवाई, ताकि उसका साइज बदल जाए। बाद में इसी “साइज़ में अंतर” के आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया।
सालों बाद, एक अन्य मामले में जेल में बंद साल्वाडोर ने अपने सह-कैदी को इस साजिश के बारे में बताया। यहीं से यह मामला उजागर हुआ और 1994 में केस दर्ज किया गया।
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लंबी कानूनी प्रक्रिया और अदालत का रुख
इस केस में कुल 29 गवाह थे, जिनमें से 19 के बयान दर्ज किए गए। चार्जशीट दाखिल होने में ही 13 साल लग गए और केस को 30 से अधिक बार टाला गया। अंततः सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एक साल के भीतर सुनवाई पूरी की गई।
प्रोसिक्यूशन ने IPC 409 (सरकारी विश्वासघात) लगाने की मांग की थी, जिसमें 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती थी, लेकिन मजिस्ट्रेट कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया।



