पवार परिवार की राजनीति में बड़ी वापसी: नगर निगम चुनाव में फिर साथ आए शरद पवार और अजित पवार
पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव में शरद पवार और अजित पवार गुट की एकजुटता ने महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। जानिए NCP विभाजन, कारण और इसके राजनीतिक असर की पूरी कहानी।
Ajit Pawar Sharad Pawar Reunion: महाराष्ट्र की राजनीति में पवार परिवार का नाम दशकों से प्रभावशाली रहा है। लेकिन पिछले दो वर्षों से यह परिवार राजनीतिक विभाजन और सार्वजनिक मतभेदों के कारण चर्चा में रहा।

अब पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव से पहले एक बार फिर अजित पवार (Ajit Pawar) और शरद पवार (Sharad Pawar) के गुटों का साथ आना राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा रहा है। यह घटनाक्रम केवल स्थानीय चुनाव तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव भी हो सकते हैं।
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NCP का विभाजन और पारिवारिक दरार
1999 में शरद पवार द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) लंबे समय तक महाराष्ट्र की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही। शरद पवार के भतीजे अजित पवार पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे और कई बार उपमुख्यमंत्री पद संभाला।
लेकिन वर्ष 2023 में राजनीति ने अचानक करवट ली। अजित पवार ने शरद पवार से अलग राह चुनते हुए भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ गठबंधन कर लिया। इस फैसले के पीछे उन्होंने पार्टी नेतृत्व में बदलाव और राज्य की राजनीतिक स्थिरता का हवाला दिया।
इस कदम ने न केवल पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया, बल्कि पवार परिवार के भीतर भी गहरी दरार पैदा कर दी।
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उम्र, नेतृत्व और सत्ता की लड़ाई
अजित पवार ने सार्वजनिक मंच से शरद पवार की उम्र और लंबे समय से पार्टी नेतृत्व में बने रहने पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अन्य पार्टियों में एक तय उम्र के बाद नेतृत्व परिवर्तन होता है और NCP में भी नई पीढ़ी को अवसर मिलना चाहिए।
उनका बयान – “आपकी उम्र 83 साल है, क्या आप कभी रुकेंगे या नहीं?” महाराष्ट्र की राजनीति में काफी चर्चा में रहा। वहीं शरद पवार ने भी साफ शब्दों में जवाब देते हुए कहा कि वह आज भी उतने ही प्रभावी हैं, चाहे उम्र 82 हो या 92।
इस वैचारिक टकराव ने अंततः पार्टी को दो गुटों में बांट दिया।
चुनावी मजबूरी या नई शुरुआत?
पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव के दौरान अजित पवार ने मंच से घोषणा की कि इस चुनाव के लिए ‘घड़ी’ और ‘तुतारी’ एक साथ आ गए हैं। यह बयान केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है। चुनाव आयोग ने अजित पवार के गुट को NCP का आधिकारिक नाम और ‘घड़ी’ चुनाव चिन्ह दिया है, जबकि शरद पवार गुट ‘तुतारी’ (घुमावदार तुरही) के साथ चुनाव लड़ रहा है।

2024 के लोकसभा चुनावों में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद अजित पवार ने यह भी स्वीकार किया कि परिवार से दूरी बनाना एक “गलती” थी। इसी आत्मस्वीकृति ने दोनों गुटों के बीच संवाद की जमीन तैयार की।
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राजनीति पर संभावित असर
पवार परिवार का यह अस्थायी या स्थायी मेल आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों के लिए नई रणनीतिक चुनौती बन सकता है। यदि यह एकता आगे भी बनी रहती है, तो महाराष्ट्र की राजनीति में NCP एक बार फिर मजबूत स्थिति में लौट सकती है।
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