चुनाव चिन्ह आवंटन नियमों को लेकर याचिका खारिज, दिल्ली हाईकोर्ट ने बरकरार रखा 1968 का सिंबल ऑर्डर
दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनाव चिन्ह आवंटन नियमों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने 1968 के इलेक्शन सिंबल्स ऑर्डर को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया।
Delhi High Court Election Symbol Order Verdict: दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में The Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनी ढांचे में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है।

यह याचिका हिंद सम्राज्य पार्टी द्वारा दायर की गई थी, जिसमें चुनाव आयोग (ECI) की उस शक्ति पर सवाल उठाया गया था, जिसके तहत वह राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित करता है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह आदेश निष्पक्ष और सुव्यवस्थित चुनाव प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
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चुनाव आयोग की शक्तियों पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता पार्टी ने तर्क दिया कि Election Symbols Order, 1968 को Representation of the People Act, 1951 की धारा 169 के तहत केंद्र सरकार द्वारा बनाया जाना चाहिए था। पार्टी का दावा था कि इस कानून के अनुसार नियम बनाने की शक्ति केवल केंद्र सरकार के पास है, वह भी चुनाव आयोग से परामर्श के बाद।
इस आधार पर यह कहा गया कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र रूप से ऐसा आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि चुनाव आयोग को संविधान और चुनाव कानूनों के तहत पर्याप्त अधिकार प्राप्त हैं।
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राष्ट्रीय और राज्य दलों की मान्यता पर विवाद
याचिका में Symbols Order के पैरा 6A, 6B और 6C को भी चुनौती दी गई थी। इन प्रावधानों के तहत किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय या राज्य पार्टी के रूप में मान्यता देने के मानदंड तय किए गए हैं।
याचिकाकर्ता का कहना था कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करते हैं। उनका तर्क था कि सभी पंजीकृत राजनीतिक दल एक ही श्रेणी में आते हैं, लेकिन मान्यता प्राप्त दलों को आरक्षित चुनाव चिन्ह और अन्य विशेष सुविधाएं देना नए और छोटे दलों के साथ भेदभाव है।

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कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि मान्यता प्राप्त दलों और गैर-मान्यता प्राप्त दलों के बीच वर्गीकरण तर्कसंगत और उद्देश्यपूर्ण है, जिसका मकसद चुनावी प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना है।
अदालत ने क्यों माना याचिका को निराधार
न्यायमूर्ति नितिन वासुदेव सांबरे और न्यायमूर्ति अनिश दयाल की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहा कि 1968 का आदेश मनमाना या असंवैधानिक है। अदालत ने माना कि चुनाव चिन्हों का आरक्षण और आवंटन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इस तरह के नियम न हों, तो चुनावों में भ्रम, अव्यवस्था और मतदाताओं को गुमराह करने की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए मौजूदा कानूनी व्यवस्था में दखल देने का कोई कारण नहीं बनता।
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हालांकि, इस मामले में विस्तृत फैसला (Detailed Judgment) अभी तक आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया है, लेकिन याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है।



