यूपी में माफिया राज को ढील? वारंट के बावजूद ‘रवि काना’ की रिहाई पर गिरी गाज, जेलर सस्पेंड, अधीक्षक पर भी जांच की तलवार!

बांदा जेल से स्क्रैप माफिया रवि काना की विवादित रिहाई ने यूपी प्रशासन में हड़कंप मचा दिया है। जानें क्यों सस्पेंड हुए जेलर केपी यादव और क्या है बी-वारंट का पूरा विवाद।

Ravi Kana: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) की बांदा जेल एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह कोई कैदी नहीं, बल्कि प्रशासन की एक बड़ी ‘चूक’ है। कुख्यात स्क्रैप माफिया रवींद्र नागर (Ravindra Nagar) उर्फ रवि काना (Ravi Kana) को जेल से रिहा किए जाने के मामले में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) शासन ने बड़ी कार्रवाई की है। कस्टडी वारंट मौजूद होने के बावजूद माफिया को रिहा करने के आरोप में बांदा जेल के जेलर केपी यादव (KP Yadav) को सस्पेंड कर दिया गया है, वहीं जेल अधीक्षक अनिल कुमार गौतम के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए गए हैं। इस घटना ने न्यायपालिका और जेल प्रशासन के बीच समन्वय पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आइए जानते हैं क्या है यह पूरा मामला और कैसे एक ‘मेल’ के इंतजार में माफिया सलाखों से बाहर निकल गया।

बी-वारंट बनाम रिहाई का खेल: आखिर कैसे बाहर निकला माफिया?

पूरा विवाद 28 और 29 जनवरी की घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। रवि काना, जिस पर गैंगस्टर और पोक्सो समेत करीब 11 से अधिक मामले दर्ज हैं, बांदा जेल में बंद था। जेल प्रशासन का दावा है कि माफिया के खिलाफ दर्ज लगभग सभी मामलों में उसकी रिहाई के आदेश आ चुके थे। जेल अधीक्षक के अनुसार, 28 जनवरी की सुबह आखिरी मामले में भी रिहाई का आदेश प्राप्त हो गया था। लेकिन इसी बीच नोएडा पुलिस ने सेक्टर-63 में दर्ज रंगदारी के एक मामले में बी-वारंट (B-Warrant) जारी करवा दिया। नियमतः बी-वारंट होने पर कैदी को तब तक नहीं छोड़ा जा सकता जब तक न्यायालय उसे व्यक्तिगत पेशी के बाद कस्टडी का निर्देश न दे दे।

Ravi Kana
Ravi Kana

कोर्ट की कड़ी फटकार: ‘क्यों न आप पर कैदी को भगाने का मुकदमा चले?’

गौतमबुद्ध नगर (Gautam Buddha Nagar) की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) की अदालत ने इस मामले पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जेल अधीक्षक को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि जब 29 जनवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए माफिया की पेशी हुई थी, तो उसे रिहा क्यों किया गया? अदालत ने इसे भारी लापरवाही करार देते हुए जेल अधीक्षक से 6 फरवरी तक शपथ पत्र के साथ जवाब मांगा है। जज ने यहां तक कह दिया, “क्यों न आपके खिलाफ अभियुक्त को हिरासत से भगाने का मुकदमा चलाया जाए?” कोर्ट की इस सख्ती के बाद डीजी जेल पीसी मीणा ने मामले की जांच डीआईजी जेल प्रयागराज को सौंपी, जिसके बाद जेलर पर गाज गिरी।

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जेल प्रशासन की दलील: ‘साढ़े छह बजे तक किया आदेश का इंतजार’

जेल अधीक्षक अनिल कुमार गौतम ने अपनी सफाई में एक तकनीकी पेच फंसाया है। उनका कहना है कि 29 जनवरी को वीसी के माध्यम से रवि काना की पेशी हुई थी, लेकिन कोर्ट ने उस समय उसे कस्टडी में लेने का कोई लिखित निर्देश नहीं दिया। जेल प्रशासन का कहना है:

  • हमने शाम 6:30 बजे तक लिखित आदेश या मेल का इंतजार किया।
  • जब कोई निर्देश नहीं मिला, तो कैदी को कानूनी तौर पर रोकना ‘अवैध हिरासत’ माना जाता, जिसके खिलाफ वह हाईकोर्ट जा सकता था।
  • हैरानी की बात यह है कि रिहाई के ठीक एक घंटे बाद यानी रात 7:45 बजे कस्टडी वारंट का मेल प्राप्त हुआ, जिसमें उसे 2 फरवरी को दोबारा पेश करने का आदेश था।

लेकिन सवाल यह उठता है कि जब जेल प्रशासन को पता था कि मामला संवेदनशील है और बी-वारंट सक्रिय है, तो महज सवा घंटे की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?

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