सिर्फ दो फिल्मों से सिनेमा इतिहास में अमर हो गए श्रीनिवासन: निर्देशन की मिसाल बने ‘वडक्कुनोक्कियंत्रम’ और ‘चिंताविष्टयाय श्यामला’
मलयालम सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और लेखक श्रीनिवासन ने केवल दो फिल्मों का निर्देशन कर अपनी विरासत अमर कर दी। जानिए कैसे ‘वडक्कुनोक्कियंत्रम’ और ‘चिंताविष्टयाय श्यामला’ आज भी प्रासंगिक हैं।
Srinivasan’s Directed Films: मलयालम सिनेमा में कुछ नाम ऐसे हैं जो संख्या से नहीं, बल्कि प्रभाव से इतिहास रचते हैं। श्रीनिवासन (Srinivasan) उन्हीं में से एक हैं। अभिनेता, पटकथा लेखक और व्यंग्य के उस्ताद श्रीनिवासन ने केवल दो फिल्मों का निर्देशन किया, लेकिन वे दोनों ही फिल्में आज क्लासिक मानी जाती हैं। उनका मानना था—
“जो 500 फिल्में मैंने नहीं कीं, वही मलयालम सिनेमा में मेरा सबसे बड़ा योगदान हैं।”

यह कथन न सिर्फ उनके सोच को दर्शाता है, बल्कि उनके काम की गुणवत्ता को भी उजागर करता है।
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वडक्कुनोक्कियंत्रम – ईर्ष्या, असुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य की कहानी
1989 में रिलीज़ हुई ‘वडक्कुनोक्कियंत्रम’ श्रीनिवासन की पहली निर्देशित फिल्म थी। इस फिल्म में उन्होंने न सिर्फ निर्देशन किया, बल्कि मुख्य किरदार थलाथिल दिनेशन की भूमिका भी निभाई।
यह कहानी एक ऐसे पति की है जो अपनी सुंदर पत्नी से खुद को कमतर समझता है और इसी असुरक्षा के कारण वह शक और मानसिक असंतुलन का शिकार हो जाता है। हास्य के माध्यम से फिल्म टॉक्सिक रिलेशनशिप, पुरुष अहंकार और मेंटल हेल्थ जैसे गंभीर विषयों को सामने लाती है।

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इस फिल्म की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी शक करने वाले पतियों को मज़ाक में ‘थलाथिल दिनेशन’ कहा जाता है। फिल्म को तीन केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड मिले, जिनमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी शामिल है।
आत्म-व्यंग्य और सामाजिक सच्चाई का अनोखा मेल
श्रीनिवासन (Srinivasan) की खासियत थी सेल्फ-डिप्रिकेटिंग रोल्स, यानी खुद पर हँसने की कला। उन्होंने समाज की सच्चाइयों को बिना उपदेश दिए, सीधे दर्शकों के दिल तक पहुँचाया।
‘वडक्कुनोक्कियंत्रम’ ने यह साबित कर दिया कि हास्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सशक्त सामाजिक टिप्पणी का माध्यम भी हो सकता है। यही कारण है कि यह फिल्म 35 साल बाद भी चर्चा में रहती है और नई पीढ़ी के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है।
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चिंताविष्टयाय श्यामला – जीवन, दर्शन और जिम्मेदारी की तलाश
लगभग एक दशक बाद 1998 में श्रीनिवासन ने दूसरी और आखिरी फिल्म ‘चिंताविष्टयाय श्यामला’ का निर्देशन किया। फिल्म की शुरुआत ही उनके व्यंग्यात्मक अंदाज़ को दर्शाती है—अंधेरी स्क्रीन, संवादों की आवाज़ और बिजली कटौती पर तंज।

कहानी एक ऐसे मध्यम आयु वर्ग के व्यक्ति विजयन की है, जो काम से बचने के लिए कभी विचारधारा तो कभी अध्यात्म का सहारा लेता है। फिल्म यह दिखाती है कि आत्म-खोज का रास्ता विद्रोह, नास्तिकता और आध्यात्मिकता से होकर गुजरता है, लेकिन अंततः जिम्मेदारी से ही जीवन का अर्थ मिलता है।
इस फिल्म को नेशनल फिल्म अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ सामाजिक मुद्दों पर फिल्म) और दो केरल स्टेट अवॉर्ड मिले। अभिनेत्री संगीता को भी उनके दमदार अभिनय के लिए सम्मानित किया गया।
निष्कर्ष: कम फिल्में, लेकिन अमर विरासत
श्रीनिवासन ने यह साबित कर दिया कि सिनेमा में संख्या नहीं, संवेदनशीलता मायने रखती है। केवल दो फिल्मों के निर्देशन से उन्होंने मलयालम सिनेमा को ऐसी कहानियाँ दीं, जो समय से आगे थीं और आज भी उतनी ही सटीक बैठती हैं।
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उनकी फिल्में हमें हँसाती भी हैं, सोचने पर मजबूर भी करती हैं और समाज का आईना भी दिखाती हैं। यही कारण है कि श्रीनिवासन सिर्फ एक फिल्मकार नहीं, बल्कि एक विचार बन चुके हैं।



