Rajya Sabha Secretariat Note: जस्टिस यशवंत वर्मा के हटाने की नोटिस को क्यों नहीं मिली चेयरमैन की मंजूरी?
राज्यसभा सचिवालय की आंतरिक नोट से खुलासा हुआ है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की नोटिस प्रक्रियात्मक और तथ्यात्मक खामियों के कारण चेयरमैन की मंजूरी नहीं पा सकी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए हैं।
Justice Yashwant Varma Removal Notice: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने के लिए लाया गया प्रस्ताव आखिर क्यों आगे नहीं बढ़ पाया?

इस सवाल का जवाब अब राज्यसभा सचिवालय की एक आंतरिक नोट में सामने आया है। Bar & Bench द्वारा एक्सेस किए गए दस्तावेज़ों के अनुसार, यह नोटिस केवल संख्या बल के बावजूद गंभीर प्रक्रियात्मक और तथ्यात्मक कमियों के कारण स्वीकार नहीं की गई। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने भी हालिया सुनवाई में अहम संवैधानिक प्रश्न उठाए हैं।
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प्रक्रियात्मक खामियों ने रोका जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्रस्ताव
राज्यसभा सचिवालय की नोट के अनुसार, जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने के लिए दी गई नोटिस में कई जरूरी दस्तावेज़ों का उल्लेख तो किया गया था, लेकिन उनकी प्रमाणित (authenticated) प्रतियां संलग्न नहीं की गई थीं।
Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत किसी भी जज के खिलाफ हटाने की प्रक्रिया में यह अनिवार्य है कि प्रथम चरण यानी admission stage पर सभी आवश्यक सामग्री स्पष्ट और प्रमाणित हो। सचिवालय ने इसे एक गंभीर त्रुटि माना।
इसके अलावा, नोट में यह भी दर्ज किया गया कि सिर्फ 50 या उससे अधिक सांसदों के हस्ताक्षर होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नोटिस का विधिक और प्रक्रियात्मक रूप से सही होना भी जरूरी है।
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तारीखों में गड़बड़ी और तथ्यों की असंगति
नोट में सबसे गंभीर आपत्ति घटनाक्रम की तारीखों को लेकर दर्ज की गई।
आरोपों का आधार बना दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आवास पर 14 मार्च 2025 को लगी आग, जिसके बाद कथित रूप से नकदी बरामद होने की बात कही गई।
हालांकि, हटाने की नोटिस में यह उल्लेख था कि तीन सदस्यीय इन-हाउस कमेटी ने 3 मार्च 2025 को घटनास्थल का निरीक्षण किया, जो आग की घटना से पहले की तारीख है। राज्यसभा सचिवालय ने इसे तथ्यात्मक असंगति (factual inconsistency) करार दिया और कहा कि ऐसे गंभीर आरोपों में इस तरह की त्रुटियां नोटिस को कमजोर बनाती हैं।

Chairman की भूमिका और संसद की सीमाएं
राज्यसभा सचिवालय की नोट में संविधान और Judges (Inquiry) Act, 1968 की विस्तृत व्याख्या की गई है।
इसमें स्पष्ट किया गया कि किसी जज को हटाने की प्रक्रिया के शुरुआती चरण में संसद की कोई भूमिका नहीं होती।
Section 3 of Judges Inquiry Act के अनुसार, हटाने की नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार करने का पूरा अधिकार केवल राज्यसभा चेयरमैन या लोकसभा स्पीकर को है।
सचिवालय ने यह भी इंगित किया कि नोटिस में यह आग्रह किया गया था कि इसे सदन द्वारा स्वीकार किया जाए, जबकि कानून के अनुसार यह निर्णय केवल Presiding Officer को लेना होता है। इसी आधार पर नोटिस को statutory framework के विपरीत माना गया।
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हस्ताक्षर सत्यापन और अंतिम निष्कर्ष
हालांकि नोटिस पर 50 से अधिक राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर थे, फिर भी तीन सांसदों के हस्ताक्षरों में specimen records से अंतर पाया गया।
फिर भी सचिवालय ने माना कि संख्यात्मक योग्यता पूरी होती है, लेकिन यह निर्णायक कारक नहीं है।
अंततः, राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन ने सचिवालय के निष्कर्ष से सहमति जताई और निर्देश दिया कि लोकसभा सचिवालय को इसकी जानकारी दी जाए।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और भविष्य के संकेत
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा कि
Secretary-General की नोट “fundamental constitutional issues” उठाती है।
पीठ ने संकेत दिया कि अदालत इस मामले में भविष्य के संवैधानिक विमर्श के लिए महत्वपूर्ण टिप्पणियां दर्ज कर सकती है।



