गिग वर्कर्स की हड़ताल: भारत में असहनीय कामकाजी हालात और 10-मिनट डिलीवरी मॉडल पर बड़ा सवाल
भारत में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स की न्यू ईयर हड़ताल ने ऐप-आधारित कंपनियों के शोषणकारी मॉडल, 10-मिनट डिलीवरी और सरकारी उदासीनता को उजागर किया है। जानिए पूरी रिपोर्ट।
Gig workers India: नए साल की पूर्व संध्या, जब ऐप-आधारित कंपनियों के लिए मुनाफा चरम पर होता है, उसी दिन भारत भर के हजारों गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स ने सामूहिक रूप से ऐप से लॉग-आउट करने का फैसला लिया।

यह केवल एक विरोध नहीं था, बल्कि उन लाखों श्रमिकों के लिए अस्तित्व की लड़ाई थी जो रोज़ की कमाई पर निर्भर हैं, कर्ज में डूबे हैं और अपनी गाड़ियों, ईंधन व मोबाइल फोन पर भारी निवेश कर चुके हैं। भारत में गिग वर्कर्स की हड़ताल ने यह साफ कर दिया कि प्लेटफॉर्म इकोनॉमी में कामकाजी हालात अब असहनीय हो चुके हैं।
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भारत में गिग इकोनॉमी का कड़वा सच
भारत में ऐप-आधारित ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर लंबे समय से अत्यधिक काम के दबाव में हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, 80% से अधिक गिग वर्कर्स रोज़ाना 10 घंटे से ज्यादा काम करते हैं, जबकि बड़ी संख्या 14 घंटे से भी अधिक काम करने को मजबूर है।
कमाई की बात करें तो अधिकांश ड्राइवर ₹15,000 से कम और डिलीवरी वर्कर्स ₹10,000 से भी कम मासिक आय पर जीवन यापन कर रहे हैं। छुट्टी लेना उनके लिए लगभग असंभव है और स्वास्थ्य समस्याएं आम हो चुकी हैं।
10-मिनट डिलीवरी मॉडल – सुविधा या खतरा?
तेज़ डिलीवरी के नाम पर शुरू किया गया 10-मिनट डिलीवरी मॉडल आज गिग वर्कर्स की जान के लिए खतरा बन चुका है। ट्रैफिक, प्रदूषण, गर्मी, बारिश और ठंड के बीच समय सीमा पूरी करने का दबाव दुर्घटनाओं को न्योता देता है।
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इस मॉडल में पूरा जोखिम श्रमिक पर डाल दिया जाता है, जबकि कीमत, रेटिंग और इंसेंटिव पर पूरा नियंत्रण प्लेटफॉर्म कंपनियों का होता है। यही कारण है कि लगभग 90% गिग वर्कर्स ने 10-मिनट डिलीवरी को “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया है।
यह सवाल अब आम नागरिक भी पूछने लगे हैं — क्या हमारी सुविधा किसी और की जान की कीमत पर होनी चाहिए?
वैश्विक बदलाव बनाम भारत की सुस्ती
दुनिया के कई देशों में गिग वर्कर्स के अधिकारों को लेकर ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। न्यूयॉर्क, मेक्सिको, कोलंबिया, ब्राज़ील और चिली जैसे देशों में प्लेटफॉर्म वर्कर्स को न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और नौकरी से हटाने में उचित प्रक्रिया का अधिकार मिला है।
इसके विपरीत, भारत में अब तक केवल सोशल सिक्योरिटी कोड में नाम जोड़ना ही पर्याप्त समझा गया है, जबकि वेतन, काम के घंटे, एल्गोरिदमिक पारदर्शिता और शिकायत निवारण जैसे मुद्दे अनदेखे हैं।
यह हड़ताल सरकार के लिए भी चेतावनी है कि अगर समय रहते ठोस नियमन नहीं हुआ, तो असंतोष और बढ़ेगा।
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